Sunday, March 28, 2010

वक़्त नहीं कटता

घडी कोई दूकान हो, जहा वक़्त बिकता हो,
तो बीतने वाले पल खरीद लाओ,
घडी कोई मकान हो, जहा वक़्त क़ैद हो,
तो सारे खिड़की दरवाज़े खोल आओ,

घडी कोई रास्ता हो, जहा वक़्त चल न पाए,
तो ज़रा सहारा दो उसे,
घडी कोई रेल हो, जिसपर वक़्त चढ़ना न चाहे,
तो जबरन लाद दो उसे,

घडी गर गिल्ली मिटटी हो, जिसमें वक़्त छुपा हो,
तो आकार दो उसे,
घडी कोई वजह हो, जिसकी आड़ में वक़्त अलसाए,
तो नकार दो उसे,

तुम्हारा मेरे पास न होना तुम्हारी मजबूरी होगी,
पर तुम कुछ तो करो जिस से के मेरा वक़्त कटे|

Posted by Narendra Jangir

“वक़्त नहींब है"

मोबाइल में दोस्तों के नाम जमा किये जा रहे है
याद कभी कर पाते नहीं
जब भूला बिसरा कोई दोस्त मिलता है
तो बहाना मारते है
“वक़्त नहीं है”

रिश्तों पर रिश्तें बनाए ही चले जा रहे है
प्यार उसमें कुछ पनपते नहीं
जब माँ बालों पर उंगलिया फेरती है
तो खीजकर कहते है
“वक़्त नहींब है”

बैंक बैलेंस दिनों दिन बङते जा रहे है
खर्च करने का मौक़ा मिलता नहीं
जब ज़रुरतमंद कुछ पैसा मांगता है तब
मुह बनाकर कहते है
“वक़्त नहीं है”

सरकार पर दोष लगाए जा रहे हैं
हमें कोई सुविधा मिलती नहीं
जब वोट डालने की बारी आती है
बिना नज़रें मिलाए कहते है
“वक़्त नहीं है”

आख़िर ये ‘वक़्त’ होता किसलिए है
इसे जीकर याद बनाते क्यूँ नहीं
फिर जब अन्तिम समय आता है
आँखों में आसू लिए पछताकर कहते है
“वक़्त नहीं है”


Posted by Narendra Jangir

" वक़्त नहीं "

हर ख़ुशी है लोगों के दामन में,
पर एक हंसी के लिए वक़्त नहीं ...
दिन रात दौड़ती दुनिया में,
ज़िन्दगी के लिए ही वक़्त नहीं .

माँ की लोरी का एहसास तो है,
पर माँ को माँ कहने का वक़्त नहीं.
सारे रिश्तों को तो हम मार चुके,
अब उन्हें दफ़नाने का भी वक़्त नहीं.

सारे नाम मोबाइल में हैं,
पर दोस्ती के लिए वक़्त नहीं.
गैरों की क्या बात करें,
जब अपनों के लिए ही वक़्त नहीं.
आँखों में है नींद भरी,
पर सोने का वक़्त नहीं.
दिल है ग़मों से भरा हुआ,
पर रोने का भी वक़्त नहीं.



पैसों की दौड़ में ऐसे दौड़े,
कि थकने का भी वक़्त नहीं.
पराये एहसासों की क्या कद्र करें,
जब अपने सपनो के लिए ही वक़्त नहीं..

तू ही बता ऐ ज़िन्दगी,
इस ज़िन्दगी का क्या होगा,
कि हर पल मरने वालों को,
जीने के लिए भी वक़्त नहीं.........